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दोनों ने रिस्क लिया, तभी मिली कामयाबी /28 Dec 2022 08:21 PM/    37 views

धीरूभाई अंबानी और रतन टाटा का जन्मदिन आज

सोनिया शर्मा
आज यानी 28 दिसंबर को भारत के 2 बड़े बिजनेस टायकून्स का जन्मदिन है। रतन टाटा 85 साल के हो गए हैंए जबकि रिलायंस के फाउंडर धीरूभाई अंबानी का ये 90वां जन्मदिन है। धीरूभाई ने जहां कपड़े के कारोबार से एक ऐसी कंपनी खड़ी की जिसका सफर एनर्जीए रिटेल से लेकर मीडिया.एंटरटेनमेंट और डिजिटल सर्विस में फैल गया है। ये कंपनी आज सुबह के नाश्ते से रात के बिंज वाच तक जिंदगी का हिस्सा है। धीरूभाई अंबानी ने जहां कपड़े के कारोबार से एक ऐसी कंपनी खड़ी की, जिसका सफर पेट्रोलियम, एनर्जी, रिटेल से लेकर कॉम्यूनिकेशन, मीडिया, एंटरटेनमेंट और डिजिटल सर्विस में फैल गया है। सुबह जागने से लेकर रात के सोने तक ये हमारी जिंदगी का हिस्सा हैं। वहीं रतन टाटा ने विरासत में सौंपी गई कंपनी को नए ऊंचे मुकाम तक पहुंचाया। न केवल टेक्नोलॉजी सेक्टर में टीसीएस को देश की अग्रणी कंपनी बनाया, बल्कि ऑटोमोबाइल सेक्टर में भी अपनी छाप छोड़ी। एअर इंडिया को साल 1950 के दशक में टाटा ग्रुप से ले लिया गया था। रतन टाटा ने उसे वापस अपने ग्रुप में शामिल किया। कई विदेशी कंपनियों के लग्जरी कार ब्रांड लैंडरोवर और जगुआर को अपने ब्रांड में जोड़ा। चाय से लेकर नमक तक में टाटा समूह का अधिकार जमाया।
तो वहीं रतन टाटा ने उन्हें सौंपी गई विरासत को एक नए मुकाम पर पहुंचाया है। उन्होंने एअर इंडिया एयरलाइंस जो 1950 के दशक में टाटा के एंपायर से सरकार के पास जा चुकी थी उसे वापस अपने एंपायर में शामिल किया है। विदेशी कंपनी फोर्ड के लग्जरी कार ब्रांड लैंडरोवर और जगुआर को अपने पोर्टफोलियो में जोड़ा। दुनिया के सबसे बड़े टी मैन्युफैक्चरर टेटली का भी अधिग्रहण किया। यूरोप के स्टील उत्पादक कोरस को भी खरीदा। इस मौके पर यहां हम दोनों दिग्गजों के 5 कॉमन बिजनेस लेसन के साथ उनके जीवन से जुड़े रोचक किस्से बता रहे हैं। ये लेसन किसी की भी लाइफ में बड़े काम के साबित हो सकते हैं।रतन टाटा आज किसी पहचान के मोहताज नहीं हैं. उनकी शख्सियत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उनके फैंस उन्हें भारत रत्न दिए जाने के लिए आवाज बुलंद.. रतन टाटा ने भारत में पहली बार पूर्ण रूप से बनी कार का उत्पादन शुरू किया। इस कार का नाम है टाटा इंडिका। भारत में सौ फीसदी बनी इस कार को पहली बार वर्ष 1998 में ऑटो एक्सपो और जेनेवा इंटरनेशनल मोटर शो में प्रदर्शित किया गया। भारतीय उद्योगपति और टाटा संस के मानद चेयरमैन रतन टाटा का आज यानी 28 दिसंबर  को 85वां जन्म दिन है। ख्यातिप्राप्त बिजनेस मैन के अलावे रतन टाटा एक मोटिवेशनल स्पीकर भी रहे हैं। वे परोपकार और मानवता की भावना के बिना कारोबार का संचालन करने में भरोसा नहीं रखते हैं। उनका जन्म 28 दिसंबर 1937 को मुंबई में नवल टाटा और सूनी टाटा के घर हुआ। वे देश के प्रतिष्ठित टाटा परिवार का हिस्सा थे। उन्होंने टाटा ग्रुप में अपने करियर की शुरुआत 25 की आयु में की।
रु 1959 में आर्किटेक्चर और स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए रतन टाटा अमेरिका गए वर्ष 1959 में आर्किटेक्चर और स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए वे अमेरिका के कॉरनेल यूनिवर्सिटी गए। साल 1962 में भारत लौटने से पहले लॉस एंजिल्स के जोन्स और इमोन्स नामक कंपनी में उन्होंने नौकरी की। 1962 में भारत लौटने के बाद बाद उन्होंने टाटा ग्रुप ज्वाइन किया। ग्रुप में उन्हें पहला काम जमशेदपुर स्थित टाटा स्टील डिविजन में मिला। वर्ष 1975 में उन्होंने हार्वार्ड बिजनेस स्कूल से प्रबंधन का कोर्स किया। वर्ष 1991 में टाटा ग्रुप के चेयरमैन बने। ये तो वे बातें हैं कि जो रतन टाटा के बारे में सब जानते हैं। पर रतन टाटा के बारे में कुछ ऐसी भी बाते हैं जो कम ही लोगों को पता है। आइए आपको इसके बारे में बताते हैं- 
रतन टाटा पहली पूर्ण रूप से भारत में बनी कार लेकर आए
रतन टाटा ने भारत में पहली बार पूर्ण रूप से बनी कार का उत्पादन शुरू किया। इस कार का नाम है टाटा इंडिका। भारत में सौ फीसदी बनी इस कार को पहली बार वर्ष 1998 में ऑटो एक्सपो और जेनेवा इंटरनेशनल मोटर शो में प्रदर्शित किया गया। इंडिका पहली देसज कार थी जो पेट्रोल और डीजल दोनों इंजनों में उपलब्ध था। रतन टाटा की अगुवाई में टाटा ग्रुप ने एंग्लो-डच स्टीलमेकर कोरस, ब्रिटिश लग्जरी ब्रांड लैंड रोवर और जगुआर का अधिग्रहण कर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अंपना डंका बजाया। रतन टाटा के नाम दुनिया की सबसे सस्ती कार टाटा नैनो बनाने की भी उपलब्धि है।साल 1950 के दशक की शुरुआत में धीरूभाई अंबानी ने अपने चचेरे भाई चंपकलाल दमानी के साथ मिलकर रिलायंस कमर्शियल कॉरपोरेशन कंपनी के तहत पॉलिएस्टर धागे और मसालों के आयात-निर्यात का व्यापार शुरू किया। यहीं से जन्म हुआ रिलायंस कंपनी का। तभी साल 1965 में चंपकलाल ने साझेदारी खत्म कर दी, पर धीरूभाई नहीं रुके। उन्होंने कपड़ा/टेक्सटाइल के बाद दूरसंचार, ऊर्जा समेत कई सेक्टरों में हाथ आजमाए और उसका रिजल्ट आज सबके सामने है। वहीं रतन टाटा साल 1962 में टाटा समूह से जुड़े। पहली नौकरी टेल्को (अब टाटा मोटर्स) के शॉप फ्लोर पर मिली। अपनी योग्यता के दम पर वह साल 1981 में टाटा इंडस्ट्रीज के चेयरमैन बनाए गए और उन्हें जेआरडी टाटा का उत्तराधिकारी चुना गया। रतन की अगुवाई में टाटा समूह की आय 100 बिलियन डॉलर को पार कर गई। रिस्क फैक्टर, डिसीजन मेकर और आईडिया जब धीरूभाई अंबानी के भाई चंपकलाल ने उनका साथ छोड़ दिया था, तब अंबानी की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी। इसके बावजूद उन्होंने रिस्क लिया और टेक्सटाइल्स के बिजनेस में हाथ लगाया और सफल हुए। उसी तरह रतन टाटा ने भी बड़ा रिस्क लिया था, जब साल 2008 में फोर्ड मोटर्स की हालत खराब थी तब रतन टाटा ने फोर्ड की जगुआर और लैंड रोवर ब्रांड को खरीद लिया। जो डील बाद में बहुत सफल साबित हुई। हालांकि, इसके पीछे लोग ये भी कहते हैं कि रतन टाटा ने फोर्ड से जगुआर और लैंड रोवर को खरीद कर कई साल पहले हुए अपने अपमान का बदला लिया था। डिसीजन मेकर की बात करें तो साल 1977 में धीरुभाई अंबानी ने आजाद भारत का पहला प्च्व् लाने का फैसला किया था। तब लोगों ने कहा था कि ये सफल नहीं होगा। इसके बावजूद 10 रुपये के भाव पर धीरूभाई ने 2.8 मिलियन शेयर जारी किये थे। आईपीओ 7 गुना ओवर सबसक्राइब किया था और निवेशकों की चांदी हो गयी, और फैसला सही साबित हुआ। 

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